कन्यादान करने का वैज्ञानिक कारण – Kanyadaan in Hindi

जब आपने कन्यादान के बारे में पहली बार सुना व देखा होगा तो आपके मन में भी यह विचार तो आया ही होगा की कन्यादान क्यों करते हैं इसको करने की क्या वजह होगी. पहली बार सोचने पर तो यह बात व्यर्थ ही मालूम हुई होगी, लेकिन कन्यादान करने के कई वैज्ञानिक कारण होते हैं जो की इस प्रकार हैं.

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कन्यादान क्यों करते हैं Kanyadaan in Hindi Language

कन्यादान का ऊँचा आदर्श केवल भारतवर्ष में ही हैं, बाकी एक भी ऐसा देश नहीं हैं जहां पर कन्यादान का प्रचलन हो. इस बारे में शास्त्र कहता हैं की कन्यादान से कन्यादाता के समस्त पितरों को निरतिशय आनंद से युक्त ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती हैं.

वर कन्या द्वारा उत्पन्न होने वाली संतति के योग से वर कूल की बारह, वधु कूल की बारह एवं स्वयं की एक यानी 25 पीढ़ियों का उध्दार होता हैं. कन्यादान करते समय एक श्लोक बोला जाता हैं जिसका अर्थ इस प्रकार होता हैं.

सुवर्ण अलंकारों से युक्त यह कन्या में ब्रह्मलोक की प्राप्ति की कामना मन में रखते हुए विष्णु रूप में मैं तुम्हें अर्पण करता हूं. इस कार्य के लिए जगत्व्याप्त परमेश्वर एवं सभी देवता साक्षी हैं. उनके समक्ष अपने पितरों के उध्दार के लिए यह कन्या तुम्हें अर्पण करता हूं. कन्यादान में पिता एक शंख में दूर्वा जल, अक्षत, पुष्पादि डालकर संकल्प करता हैं.’

दोनों और के आचार्य ब्राह्मण सभी केसामने वर एवं कन्या के गोरा, प्रवर शाखा एवं तीन पीढ़ियों के क्रमिक व्यक्तियों का नामोच्चार करते हुए परिचय देते हैं. एक बार नहीं, अपितु तीन बार यह परिचय दोहराते हैं, जिसका अभिप्राय यह हैं की यदि उन दोनों के कूल गोत्रादि के सम्बन्ध में किसी को कोई संदेह हो, तो वह व्यक्ति अब भी आपत्ति कर सकता हैं और विवाह रोका जा सकता हैं.

इस शाखोच्चार के साथ अनन्तर संकल्प पूरा हो जाता हैं. प्रदाता ने कन्या का दाहिना अंगूठा वर के हाथ में अर्पित करते हुए शंखस्थ जलधारा उसके ऊपर डाल दी, मानो इस संकल्प को और भी दृढ़ कर दिया.

कन्यादान करने का वैज्ञानिक कारण

शंखादि सभी पदार्थ मांगलिक होने के साथ-साथ वास्तु विज्ञानं की दृष्टि से अपनी-अपनी विशेषताओं से भरपूर हैं. शंख असंक्रमणशील परमाणुओं से बना हुआ पदार्थ हैं. इसमें डाली वस्तु उसी रूप में विधमान रहती हैं.

कन्यादान के जिस पवित्र भाव से उसमे जल डाला गया हैं, उसका प्रभाव वर वधि के भावी दांपत्य जीवन पर पड़ेगा और उनका प्रेम उसी शंखस्थ जल की धरा के सामान सर्वदा निर्मल रहेगा.

वनस्पति की दृष्टि से दूर्वा की कुछ अपनी ही विशेषताए हैं. एक स्थान पर उत्पन्न होने पर वह निरंतर फैलती ही चली जाती हैं. कितना भी काटो, फिर हरी हो जाती हैं. उन दम्पतियों के प्रेम में यही विशिष्टता हो, वह निरंतर वृद्धि को प्राप्त हो, सदा हरे, भरे रंग से भरा उनका जीवन हो – इस विचार दृढ़ता के लिए उसका सानिध्य नितांत उपयोगी हैं.

जल का तो कार्य ही सम्पूर्ण वस्तुओं का एकीकरण हैं, बिखरे हुए मिटटी के भिन्न-भिन्न परमाणुओं को संयुक्त कर जल विशाल भवनों का रूप दे देता हैं. शरीर में विधमान ‘मन” जलीय अंश से ही उतपन्न है. अतः जल के माध्यम से ही कन्या प्रदाता अपनी हृदयगत भावना को वर के मन में दर्द करता हैं.

तो दोस्तों आपने जाना के कन्यादान क्यों करते हैं, इसके पीछे यही वैज्ञानिक कारण होते हैं. अगर आपको कन्यादान क्यों किया जाता हैं इस विषय में कोई जानकारी हो तो Comment के जरिये हमें जरूर बताये.

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