हमारी तलाश | हम वहीँ देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं

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Story With Moral in Hindi

moral story

अच्छे को अच्छा बुरे को बुरा ही दीखता हैं

एक बार की बात है गुरू द्रोणाचार्य ने दूर्योधन और युद्धिष्ठीर की परख लेनी चाही उन्होंने एक ओर युद्धिष्ठीर से कहा कि जाओ और यह पता लगाकर आओं कि राजधानी में दूर्जन पुरुष कितने हैं ? दूसरी ओर उन्होंने दूर्योधन को भी आदेश दिया की वह जानकारी लेकर आयें कि राजधानी में सज्जन पुरूष कितने हैं ?

गुरु द्रोणाचार्य का आदेश पाते ही दोनों पुत्र अपनी-अपनी खोज में निकल गयें | जब दोनो पुत्रों ने राजधानी का विस्त्रत भ्रमण कर लिया तब वे द्रोणाचार्य के सम्मुख उपस्थित हुए । युद्धिष्ठीर को एक भी दूर्जन पुरूष नही मिला, दूर्योधन को एक भी सज्जन पुरूष कि दर्शन नहीं हुए। द्रोणाचार्य दोनो राजपुत्रों का उत्तर सुनकर मुस्कुरायें।

उन्होंने इस घटना की व्याख्या की, कि युधिष्ठीर को एक भी दूर्जन नहीं मिला क्योंकि वह स्वयं सज्जन हैं। दुर्योधन को कोई सतपुरूष नहीं दिखा क्योंकि सज्जनता में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। मुख्य बात यह हैं कि हम जो होते हैं उसी की तलाश कर लेते है।

एक बहुत पुरानी कहावत है न की हम वहीँ देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं  |

उदाहरण

मान लीजिये की एक बहुत सुन्दर जंगल हैं, उस जंगल में अगर एक सौंदर्य-प्रेमी आएगा तो वह जंगल की सुंदरता को देखेगा, और अगर उसी जंगल में अगर कोई लकड़हारा जायेगा तो उसे जंगल में पेड़ों की लकड़ियाँ दिखेंगी, कोई शिकारी जायेगा तो उसे वहां के जानवर दिखेंगे | यह सब हमारी दृष्टि की बात हैं, यह सच है की जो हम जो देखना चाहते हैं वही देख लेते हैं | हमारी दृष्टि – नीचे दी गई यह कहानियां भी पढ़ें यह भी हमारे देखने के नजरिये से सम्बंधित हैं.

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