Meditation

All About Pranayama in Hindi – प्राणायाम और कुंडलिनी शक्ति (Benefits Labh)

Yoga Pranayama in Hindi Breathing Exercise Kundalini

pranayama in hindi
जानिये खास प्राणायाम के बारे में

Science behind yoga pranayama in hindi with its benefits (for kundalini jagran or activation) योगासन के आठ अंगों में चौथा अंग प्राणायाम का होता है, प्राणायाम के जरिये शरीर शुद्धि की जाती है. रोजाना के प्राणायाम अभ्यास से शरीर स्वस्थ, निर्गुण, हल्का और सुन्दर होने लगता है.

हमारे फेफड़ों में हजारों Cells होते है, इनमे ज्यादातर Carbon-Dioxide ही भरी हुए रहती है, अगर हम प्राणायाम के जरिये इन Cells में ताज़ा Oxygen पहुंचा दे तो हमारे जीवन जीने का आयाम ही बदल जाता है.

आप फिर वह नही रह जाते जो आप पहले थे आदि प्राणायाम करने के फायदे बहुत से होते है (pranayama benefits for health & kundalini), प्राणायाम खासकर उन लोगों के लिए बहुत जरुरी होता है जो की अपनी कुंडलिनी को जगाना चाहते हैं, (pranayama se kundalini jagran kaise kare).

Read on Pranayama Benefits Ke Labh

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जानिए रोजाना नियमित प्राणायाम करने के अनियमित फायदों के बारे में

Pranayama Benefits For Kundalini Awakening

Pranayama for kundalini jagran
Pranayama For Kundalini Awakening.

वैसे तो प्राणायाम बहुत प्रकार के होते हैं, इसलिए हम महत्वपूर्ण प्राणयाम के बारे में Detail में बताएंगे (वह प्राणायाम जो की एक सामान्य व्यक्ति और योग के नए साधक या वह जो कुंडलिनी जागरण करना चाहते है उनके लिए मददगार हो ऐसे ही प्राणायाम हम बताएंगे इन हिंदी में) pranayama se kundalini jagane ke aasan tarike.

हमेशा प्राणायाम को खुली और साफ़ जगह पर करे. ऐसी जगह पर करे जहाँ ताज़ा हवा आती जाती रहती हो.

Types Of Pranayama (ke prakar)

चंद्रभेदन, सूर्यभेदन, नाड़ीशोधन, उज्जाई, भ्रस्त्रिका, कपालभाती, दीर्घ, शीतकारी, कुंभक, मूर्छा, शीतली, प्रणव, अग्निसार, उद्गीथ, नासाग्र, प्लावनी, शितायु, कण्ठ वातउदा पूरक, सुख प्रसारण पूरक कुम्भक, नाड़ी शोधन व नाड़ी अवरोध, अनुलोम-विलोम, अग्नि प्रदीप्त, अग्नि प्रसारण, एकांड स्तम्भ, सीत्कारी, सर्वद्वारबद्व, ऊर्ध्वमुख भस्त्रिका, मुखपूरक कुम्भक, वायुवीय कुम्भक, वक्षस्थल रेचन, दीर्घ श्वास-प्रश्वास, प्राह्याभ्न्वर कुम्भक, षन्मुखी रेचन, चन्द्रभेदन, यन्त्रगमन, वामरेचन, दक्षिण रेचन, शक्ति प्रयोग , त्रिबन्धरेचक, कपाल भाति, हृदय स्तम्भ, मध्य रेचन, त्रिबन्ध कुम्भक. (list of all pranayama names)

यह बताये जा रहे प्राणायाम कुंडलिनी जागरण करने में मदद करते है. इनको आम सामान्य व्यक्ति भी कर सकते है. जिनको कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करना है वह इन प्राणायाम को नियमित ढंग से बताये जा रहे सूत्रों के हिसाब से करे.

प्राणायाम कब करना चाहिए (प्राणायाम करने के सही समय)

प्राणायाम के लिए याद रखें, कभी रात्री के समय इसका अभ्यास न करें. क्योंकि रात्री के समय वायुमण्डल में Carbon Dioxide की मात्रा ज्यादा होती है. प्राणायाम करने का उपयुक्त समय प्रातःकाल (Morning time) है. वैसे दिन में कभी भी किया जा सकता है.

प्रातःकाल सूर्य निकलने से पूर्व का वातावरण अच्छा होता है. प्राणायाम खुले वातावरण में जहां शुद्ध वायु मिल सके वहां करना चाहिए. साधक को ध्यान में उन्नति के लिए तीन बार प्राणायाम करना चाहिए. क्योंकि रोजाना भोजन करते हैं, उसमें (अन्न में) अशुद्धता होती है, यह अशुद्धता हमारे अंदर सूक्ष्म रूप से प्रभावित करती है.

प्राणायाम करते समय सीधे बैठना चाहिए. सीधे बैठकर पूरक करने से फेफडे में प्राणवायु ज्यादा भरती है, तथा सभी अंगों में रक्त संचार सही रूप से होता है. श्वास हमेशा गहरी लेनी चाहिए. प्राणायाम करते समय तीन तरह की क्रियाएं होती है.

पुरक – गहरी व दीर्घ श्वास लेते हुए प्राणवायु (oxygen) को अंदर खींचना. एक बार में जितनी ज्यादा से ज्यादा श्वास खींच सकें, उतनी खींचना चाहिए. श्वास को अंदर खींचने को पूरक प्राणायाम कहते हैं. (inhale deeply)

कुम्भक – अंदर ली गई श्वास को रोके रखना कुम्भक कहते है. हमें श्वास उतनी देर रोक कर रखनी चाहिए कि शरीर के किसी अंग पर अनावश्यक दबाव न पडे, जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए.

कुम्भक में थोडा हठ अवश्य करना पडता है, मगर उचित मात्रा में. अभ्यास बढने पर कुम्भक की अवधि बढानी चाहिए. कुम्भक जितना ज्यादा देर का होगा, उतना ही साधक को लाभ होगा.

रेचक – कुम्भक द्वारा रोकी गयी प्राणवायु को बाहर निकालने को रेचक कहते हैं. रेचक करते समय प्राणवायु को धीरे-धीरे बाहर निकालनी चाहिए. इस समय जल्दबाजी न करें, संयम बरतें. (Exhale deeply and slowly)

सिर्फ साधक के लिए – पहली बार प्राणायाम तब करें, जब आप सुबह का ध्यान समाप्त करें. तब आसन व प्राणायाम करें. सुबह का प्राणायाम अच्छा होता है. यदि आप दिन में तीन बार प्राणायाम करते हैं तो दूसरी बार प्राणायाम दोपहर के भोजन करने से पहले खाली पेट में करें. तीसरी बार, अपनी सुविधानुसार सूर्य डूबने से पहले करें. तीन बार प्राणायाम से नाडी जल्दी शुद्ध होती है. साधना मे नाडी शुद्धि का बडा महत्व है.

सूर्य नाड़ी और चंद्र नाड़ी प्राणायाम करे

प्राणायाम करते समय भूमि पर कुछ बिछा लें. चादर या कंबल बिछा सकते हैं. अब बिल्कुल सीधे होकर बैठ जायें. आप अपनी पसंद का कोई भी आसान जो आपको सिद्ध हो वह लगाकर बैठ जायें. आप अपने अंदर की सारी वायु जोर लगाकर निकाल दें

फिर दाहिने हाथ के अंगूठे से नांक का दाहिना छिद्र दबाव देकर बंद कर दे. मध्यमा और अनामिका अंगुली मिलाकर नांक का बांया छिद्र दबाव देकर बंद कर दें. अन्य दोनों उंगलियों को सीधा रखें. अब बाए छिद्र से उंगलियों का दबाव हटाकर इसी बाए छिद्र से जोर से गहरी श्वास लें.

श्वास इतनी गहरी लें कि आपके फेफडे पूरी तरह से वायु द्वारा भर जायें. फिर मध्यमा और अनामिका उंगली के दबाव से बांया छिद्र बंद कर दें और कुम्भक करें. ध्यान रहे जिस छिद्र से श्वास ले रहे हो प्राणवायु सिर्फ उसी छिद्र से जाये, दूसरी छिद्र को पूर्ण रूप से बंद रखना चाहिए.

अब आपसे जितना कुम्भक हो सके उतना ही कीजिए. ज्यादा जबरदस्ती दबाव नहीं देना चाहिए. जब आपको कुम्भक के कारण घबराहट सी होने लगे तो दाहिने छिद्र से अंगूठे को हटाकर धीरे-धीरे रेचक कर देना चाहिए.

रेचक करते समय श्वास जल्दी से बाहर न निकालें. पूरी तरह से रेचक करने के बाद कुछ क्षण रूकें. फिर उसी दाहिने छिद्र से जोर से गहरी स्वास लेकर पूरक करें. फिर दाहिने छिद्र को अंगूठे के दबाव से बंद कर दें. फिर कुम्भक करें.

कुम्भक करने के बाद बाएं छिद्र से रेचक कर दे. फिर पहले की भांति कुछ क्षण रूक कर बाए छिद्र से पूरक करेें. फिर अपनी क्षमतानुसार कुम्भक करके दायें छिद्र से निकाल दें. कहने का मतलब हैं जिस छिद्र से पूरक करते हैं तो रेचक दूसरे छिद्र से करें.

जिससे रेचक करें उसी से पूरक करें इसी प्रकार एक छिद्र से छः बार और दूसरे छिद्र से छः बार कुल मिलाकर 12 बार प्राणायाम करें. इसको एक बार का प्राणायाम कहेंगे.

इसको सूर्य नाडी चंद्र नाडी प्राणायाम कहते हैं. रीढ की हड्डी के बायीं ओर चंद्र नाडी होती है और दाहिनी और सूर्य नाडी होती है, इन्हें इड़ा और पिंगला नाडी भी कहते हैं. नाक के बायें छिद्र से जब स्वास लेते हैं तो इससे चंद्र नाडी प्रभावित होती है.

नाक के दाहिने छिद्र से जब स्वास लेते हैं तो सूर्य नाडी प्रभावित होती हैं. जब इस प्राणायाम का अभ्यास अच्छा हो जाता हैं तो पूरक करते समय सोचते हैं कि प्राणवायु मूलाधार में एकत्र हो रही है. कुछ समय पश्यतात आपको महसूस होने लगेगा कि स्वास द्वारा खीची गयी प्राणवायु मूलाधार में एकत्र हो रही है.

कुछ समय बाद आपको महसूस होने लगेगा कि स्वास द्वारा खींची गयी प्राणवायु मूलाधार में जा रही है. कुम्भक करते समय जब प्राणवायु मूलाधार में दबाव बढायेगी तब कुण्डलिनी पर धक्के लगने शुरू हो जायेंगे जिससे कुण्डलिनी जाग्रत होने में सहायता मिलेगी.

इस प्राणायाम से नाडियाॅं बहुत जल्दी शुद्ध हो जाती है. पाचन क्रिया शीघ्र होन लगती है चेरहे पर तेज आता है.

इस प्राणायाम को सामान्य जीवन जीने वाले को भी करना चाहिए यह शरीर शुद्धि के लिए बहुत लाभकारी होता है. शरीर को स्वस्थ करता है, पाचन शक्ति बढ़ाता है, सोचने समझने की क्षमता बढ़ता है और साथ ही कुंडलिनी को जगाने में भी मदद करता है. Helps in increases memory power, will power, mental power and improves positive thinking.

भस्त्रिका प्राणायाम से कुंडलिनी जगाये

यह pranayama भी Kundalini jagran में मदद करता है. सहजासन या पदमासन पर सीधे होकर बैठ जायें. नाक के दोनों छिद्रो से जोर से स्वास खीचें फिर बिना कुम्भक किये जोर से स्वास निकाल दें. फिर दोनों छिद्रों से जोर से स्वास खींचे अर्थात पूरक करें. बिना कुम्भक किये रेचक जोर से कर दें.

इस प्राणायाम में कुम्भक नहीं करते हैं सिर्फ पूरक व रेचक करते हैं. रेचक करते समय जोर से प्राणवायु की आवाज आती है. ऐसा लगता हैं जैसे नाग फुत्कार रहा हो, रेचक करते समय जोर से नाभि को पीछे की ओर धक्का देते हैं ताकि पेट में वायु न रह जाये.

यह प्राणायाम अपनी शक्ति के अनुसार करें शरीर थकने लगे तो बंद कर दें. शुरूआत में पंद्रह से बीस प्राणायाम करें. यदि शरीर बहुत कमजोर हो तो इस प्राणायाम को न करें. इस प्राणायाम से फेफडा, हृदय व रक्त ले जाने वाली धमनियां व रक्त वापस ले जाने वाली शिराएं बडी तेजी से कार्य करती हैं.

शरीर में गर्मी भी बढती है, थकान भी महसूस होती है. इस प्राणायाम में नाडी शुध्द बडी तेजी से होती है. यदि इस प्राणायाम को करते समय साधक जालंधर बंध लगा ले तो प्राणवायु मूलाधार में सीधी टक्कर मारती है, इससे कुण्डलिनी जाग्रत होने में सहायता मिलती है.

साधक को ऐसी अवस्था आती हैं कि भस्त्रिका प्राणायाम स्वमेव होने लगता है. एक समय जब ध्वानावस्था में भस्त्रिका अपने आप चलने लगे तो समझ लेना चाहिए कि साधक की कुण्डलिनी जाग्रत होती गयी है.

जाग्रत होने का अर्थ उर्ध्व होने से नहीं है सिर्फ आंख खोल दी है. क्योंकि आंख खुल जाने पर भी वह अपनी पहले जैसी अवस्था में बनी रहती है. उर्ध्व होने का अर्थ हैं ऊपर की ओर चढना. जब साधना अच्छी हो जाती हैं और नाडी शुध्द होने लगती हैं. तब स्वमेव भस्त्रिका चलने से भी नाडी शुध्द होती है.

इस अवस्था में साधक को भस्त्रिका प्राणायाम अधिक से अधिक कई बार करना चाहिए. साधक की ध्यानावस्था में जब भस्त्रिका चलती हैं तो ऐसा लगता हैं मानो नाग फुस्कार मार रहा है.

भस्त्रिका प्राणायाम सिर्फ वह लोग करे जिनके फेफडें मजबूत हो क्योंकि इस प्राणायाम में स्वांस के आने जाने की क्रिया बड़ी तेजी से होती है. यह प्राणायाम नाड़ी शुद्धि के लिए बहुत फायदेमंद होता है और साथ ही कुंडलिनी शक्ति को जगाने में भी मदद करता है.

त्रिबंध रेचक (Super Pranayama for Kundalini)

सबसे पहले आप वज्रासन पर बैठ जाइए. पेट की सारी प्राणवायु बाहर निकाल दें. अब मूल बंध, उड्डियान बंध, जालन्धर बंध तीनों बंध लगाकर बैठ जायें. फिर आंखे बंद कर लीजिए. कुछ दिन अभ्यास करने के बाद आपका पेट पीछे की ओर चिपकने लगेगा.

मूलाधार में भी खिंचाव होना शुरू हो जायेगा. इस प्राणायाम में बाहरी कुम्भक ही किया जाता है. जब पूरक करना हो तो गर्दन सीधी करके पूरक कर लें, तुरंत रेचक कर दें और बंध लगा लें.

इस प्राणायाम से कुण्डलिनी जाग्रत होने में सहायता मिलती है. जिन साधकों की कुण्डलिनी जाग्रत हो उन्हें यह प्राणायाम जरूर करना चाहिए. जिससे कुण्डलिनी ऊध्र्व होने में सहायता मिलती है.

भ्रामरी प्राणायाम (Pranayama For Mental Peace in Hindi)

सबसे पहले सहजासन पर सीधे होकर बैठ जाए नाक के दोनों छिद्रों से जोर से स्वास अंदर की ओर खीचें. सिर को पीठ की ओर झुकाएं. सिर का पिछला हिस्सा पीठ से स्पर्श करायें. इससे आपकी गर्दन पीछे की ओर मुड जायेगी.

फिर अपने गले के अंदर उंऽऽऽऽऽऽ,उंऽऽऽऽऽऽ की आवाज थोडे तेज स्वर में उत्पन्न कीजिए. जब कुम्भक समाप्त हो जाये फिर पूरक करके कुम्भक कीजिए. फिर इसी प्रकार आवाज निकालिए, इसी प्रकार प्राणायाम कीजिए.

यह प्राणायाम आप पांच मिनट तक कीजिए. जब उंऽऽऽऽऽ,उंऽऽऽऽऽऽ की आवाज उत्पन्न करते हैं, तब ऐसा लगता हैं जैसे भौंरे की आवाज निकल रही है. इसीलिए इसको भ्रामरी (भौंरा) प्राणायाम कहते हैं.

यह प्राणायाम उन साधकों के लिए अति आवष्यक हैं, जिनकी साधना कण्ठ चक्र में चल रही है. हम पहले लिख चुके हैं कण्ठ चक्र के लिए यह प्राणायाम किया जाता है. इस ग्रंथि के खुलने में कुण्डलिनी भी सहायता करती है.

वह अपने मूॅंह से धक्का मार-मार कर ग्रंथि को खोलने का प्रयास करती है. इसी जगह को भ्रामरी गुफा भी कहते हैं. जब साधक की साधना उग्र होती हैं तो ध्यानावस्था में स्वमेव गर्दन पीछे चली जाती है और साधक के मूॅंह से उंऽऽऽऽऽ,उंऽऽऽऽऽऽ की आवाज निकलने लगती है.

भ्रामरी प्राणायाम के बहुत फायदे होते है, इसको करने से तुरंत मानसिक शांति मिलती है, मन शांत होता है, मानसिक क्षमता बढ़ती है और सभी तरह के मानसिक विकार दूर होते है. इसके साथ ही यह कुंडलिनी शक्ति के जागरण में भी मदद करता है.

सर्वद्वार बंद प्राणायाम (Pranayama for third eye activation)

सर्वप्रथम अपने सिद्ध आसन पर बैठ जाइए. नाक के द्वारा गहरी लंबी स्वास लीजिए. फिर दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों कान बंद कीजिए. दोनों तर्जनी उंगली से दोनों आंखे बंद कीजिए.

दोनों मध्यमा उंगलियों से नाक के दोनों छिद्र बंद कीजिए. अन्य चारों उंगलियों से मूंह बंद कर लीजिए. मूलबंध लगाकर मन भृकुटी में केंद्रित कीजिए. जब मन घबराने लगे तो नाक से रेचक कर दीजिए. फिर पूरक करके नाक के दोनों छिद्रों को बंद कर दीजिए.

धीरे-धीरे कुम्भक की अवधि बढानी चाहिए. यह प्राणायाम उन साधकों को ज्यादा लाभकारी सिद्ध होगा जिनका कण्ठचक्र खुल गया है. आज्ञा चक्र में यह प्राणायाम सहायक होता हैं. इस प्राणायाम को करने से मन एकाग्र होता है. (agya chakra kholne (jagrat) karne ke liye pranayama).

सीत्कारी प्राणायाम

अपने किसी सिद्ध किये हुए आसन पर बैठ जाइए फिर अपनी जीभ मूंह से बाहर निकालिए. जीभ के दोनों किनारों को ऊपर की ओर मोडते हुए आपस में मिलाइए अब आपकी जीभ पोली नल की ही तरह हो जायेगी.

कौवे के चोंच के समान बाहर निकालिए. जीभ की जो पोली जगह हैं उसी से गहरी स्वास लेते हुए पूरक कीजिए. फिर उसे बिना कुम्भक किये नाक के दोनों छिद्रों से रेचक कर दीजिए. उसी जीभ के सहारे पूरक कीजिए.

पूरक करते समय सीऽऽऽऽऽ,सीऽऽऽऽऽ की आवाज आनी चाहिए. इसीलिए इसको सीत्कारी प्राणायाम कहते हैं. फिर बिना कुम्भक किये नाक से प्राणवायु को रेचक कर दीजिए. यह प्राणायाम तब किया जाता हैं जब शरीर में अधिक गर्मी हो. अथवा ग्रीष्म काल में करना चाहिए.

शीतली प्राणायाम

सीत्कारी और शीतली प्राणायाम में कोई विशेष अंतर नहीं है. अपनी अच्छानुसार किसी आसान पर बैठ जाइए औश्र सीत्कारी प्राणायाम की भांति जीभ को मूंह के बाहर गोलाकार करते हुए निकालें. अब जीभ के सहारे प्राणवायु को लंबा गहरा खींचे और कुंभक करें.

जब मन घबराने लगे तो नाक के दोनों छिद्रों से रेचक कर दे, पूरक करने से जो जीभ द्वारा ठंडी प्राणवायु अन्दर खींचते हैं उससे सारे शरीर को ठंडक मिलने लगती है, जिससे शरीर में गर्मी कम होती है.

यह प्राणायाम ग्रीष्म काल में करना चाहिए. शरीर में ध्यान के कारण जब अधिक गर्मी हो गयी हो, तब भी यह प्राणायाम बहुत उपयोगी है. साधक की कुण्डलिनी अगर उग्र हैं तो जाग्रत होने के कुछ समय बाद पृथ्वीतत्व व जलतत्व को खोना शुरू कर देती है.

जिससे पेट के अन्दर स्थित आंतों में पानी की मात्रा कम होने लगती है. जिससे साधक को अत्यधिक शारीरिक कष्ट भोगना पडता है. उस समय दोनों सीत्कारी और शीतली प्राणायाम करना चाहिए. जिससे शरीर के अंदर ठंडक मिलती है. इससे राहत महसूस होती है.

सूर्य नाडी प्राणायाम

आसन लगाकर सीधे बैठ जोयं. दाहिने हाथ के अंगूठे से नाक का दायां छिद्र अर्थात सूर्य नाडी बंद कर दें. मध्यमा और अनामिका से बांया छिद्र अर्थात चंद्र नाडी बंद कर दें. इससे पूर्व आप अपने शरीर की प्राणवायु पूरी तरह से निकाल दें. अब चंद्र नाडी को बंद रखें.

सूर्य नाडी से पूरक करें. गहरी स्वास लेते हुए आप अंगूठे से दबाव देकर दाहिना छिद्र बंद कर दें और कुम्भक करें. जब रेचक करना हो तो सूर्य नाडी से ही करें. सारी प्राणवायु जोर लगाकर निकाल दें. कुछ क्षण रूक कर फिर सूर्य नाडी से पूरक करें और कुम्भक करें.

इस प्राणायाम को सूर्य नाडी से ही पूरक करेंगे और इसी से रेचक करेंगे. इस प्राणायाम को तब तक करते रहें ,जब तक शरीर में गर्मी महसूस न होने लगे अथवा भीषण गर्मी न लगने लगे. क्योंकि सूर्य नाडी गर्म होती हैं, इसके द्वारा किया गया प्राणायाम पेट में गर्मी बडाती हैं. सर्दी से छुटकारा मिल जाता है.

सूर्य नदी प्राणायाम ठन्डे शरीर वालो के लिए बहुत लाभकारी होता है, यह शरीर में गर्मी पैदा करता है.

बाह्म कुम्भक के लिए टिप्स

जब आप रेचक करें तो पूरी तरह से प्राणवायु निकाल देनी चाहिए. फिर आप कुछ समय तक पूरक न करें. रेचक के बाद और पूरक से पहले की जो अवधि बिना प्राणवायु की कहते हैं, उसे बाह्म कुम्भक कहते हैं.

शुरुआत में यह अवधि बिल्कुल कम होगी, क्योंकि वायु के बिना शरीर के अंदर घबराहट सी होती है. साधक को धीरे-धीरे अभ्यास के द्वारा बाहरी कुम्भक की अवधि बढाना चाहिए. जिन साधकों की कुण्डलिनी ऊध्र्व होती हैं, उन्हें बाहरी कुम्भक का अभ्यास ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए. बाह्म कुम्भक के समय कुण्डलिनी उग्र होती हैं तो ऊध्र्व होने में सहायता मिलती है.

Caution – प्राणायाम करते समय सावधानिया

प्राणायाम करते समय सावधानियां बरतनी चाहिए. शुरू में जिस प्राणायाम को करने वाले हो  उसे अच्छी तरह से समझ लीजिए अथवा किसी अनुभवी व्यक्ति से पूछ लीजिए, फिर प्राणायाम करें. सर्दी की ऋतु में सीत्कारी, शीतली व चंद्रनाडी प्राणायाम नहीं करना चाहिए,

क्योंकि इन प्राणायामों से ठंडक उत्पन्न होती हैं. यदि आपकी उग्र साधना के कारण कुण्डलिनी उग्र हैं, यदि शरीर में गर्मी ज्यादा महसूस होती हो तो आप उचित मात्रा में प्राणायाम कर सकते हैं.

जिन व्यक्तियों को वातदोष की शिकायत हैं वह भी सर्दी के समय यह प्राणायाम न करें. जिन्हें वातदोष की शिकायत रहती हैं, वह सूर्य नाडी चंद्र नाडी प्राणायाम, सूर्य नाडी प्राणायाम व भस्त्रिका प्राणायाम करें जिससे वात की शिकायत धीरे-धीरे कम हो जायेगी.

प्राणायाम के समय कुम्भक जितना ज्यादा किया जाता हैं, मन को उतना ज्यादा स्थिर रहने की आदत पडती हैं. प्राणायाम साधक को ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए. इससे नाडी शुद्ध होती हैं, रोग दूर होते हैं तथा कुण्डलिनी जाग्रत होने में सहायता मिलती है.

प्राणायाम का कुण्डलिनी से निकट का संबंध है. किसी-किसी स्थान पर प्राणायाम के लेखों में  उल्लेख आता हैं कि प्राणायाम एक अनुपात में करना चाहिए. मगर हमने अनुपात का ध्यान नहीं दिया है. साधक अपनी सामथ्र्य के अनुसार कुम्भक करें.

कुम्भक करते समय अत्यंत सूक्ष्म रूप से मंत्र का भी जाप किया जा सकता है. कुछ लोग कुम्भक के समय गिनती भी गिनते हैं. कुम्भक की अवधि बढाने के लिए यदि आप चाहें, तो कुम्भक के समय कुछ न करें सिर्फ शांत होकर बैठे रहें.

जब आप प्राणायाम का अभ्यास कर रहे हों, उस अवधि में आप सात्विक भोजन को लिया करें. क्योंकि भोजन का प्राण से निकट सबंध है। भोजन के सूक्ष्म भाग से प्राण का निर्माण होता है. यदि भोजन तामसिक और अशुद्ध हैं तो प्राण वैसा ही अशुद्ध होगा.

प्राण मन को शक्ति देता हैं, इसलिए मन भी अशुद्ध व चंचल होता है. प्राणायाम के द्वारा प्राण का शुद्धिकरण होता है. इसलिए साधक को भोजन पर विषेष ध्यान देना चाहिए.

वैसे प्राण भी स्वयं एक कोष (प्राणमय कोष) है. साधकों को अपनी साधना में उन्नति के लिए प्राणायाम कोष को शुद्ध करना पडेगा. प्राणमय कोष तभी शुद्ध होगा जब उसका अन्नमय कोष शुद्ध हो चुका होगा.

अन्नमय कोष के अंतर्गत स्थूल शरीर आता हैं और प्राणमय कोष के अंतर्गत सूक्ष्म शरीर आता है. जिस साधक का प्राणमय कोष शुद्ध होता हैं, वह अपने सूक्ष्म शरीर पर अधिकार कर लेता है. सूक्ष्म शरीर की गति बहुत तेज होती हैं तथा पृथ्वीलोक से बाहर सूक्ष्म लोकों तक उसकी पहूंच होती है.

क्योंकि सूक्ष्म लोकों को निर्माण सूक्ष्म पंच भूतों के द्वारा हुआ है, इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर का निर्माण भी सूक्ष्म पंचभूतों द्वारा हुआ है. दोनों का निर्माण सूक्ष्म पंचभूतों द्वारा होने के कारण आपस में तारतम्य बना हुआ है.

यह तारतम्य अतिसूक्ष्म रूप से होता है. इसीलिए सूक्ष्म शरीर जब अभ्यास के द्वारा शुद्ध होने लगता हैं तब सूक्ष्म शरीर की गति व व्यापकता सूक्ष्मजगत (सूक्ष्म लोकों) होने लगती है. साधक अपने सूक्ष्म शरीर के द्वारा दूसरे लोकों का भी ज्ञान हासिल कर सकता है. तथा साधक की अन्तर्शक्ति भी बढ जाती है.

साधक की जब साधना उच्च स्थिति पर होती हैं, इसी प्राणों की सहायता से दूसरों पर शक्तिपात कर सकता है. यही प्राणवायु जिस साधक पर शक्तिपात किया गया हो उसके शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रवेष करके आर्य करने लगती है. सदगुरू अपने शिष्यों पर जों शक्तिपात करता हैं वह यही सूक्ष्म रूप से प्राणवायु होती है.

Source pranayama details in hindi : यह प्राणायाम के बारे में जानकारी हमने योगी आनंद जी से प्राप्त की थी, यह उनके द्वारा बताई गई थी. योगी आनंदी जी उच्च अवस्था को प्राप्त योगी है. जो की अब साधकों को मार्ग दिखाते हैं. अगर आपको प्राणायाम या योग, कुंडलिनी जागरण कैसे करे आदि के बारे में कुछ पूछना हो तो आप योगी आनंद जी से Facebook, Gmail पर संपर्क कर सकते हैं. हम योगी आनंद जी से संपर्क करने के सूत्र के बारे में निचे जानकारी दे रहे हैं.

उम्मीद है दोस्तों आपको प्राणायाम के फायदे और प्राणायाम कैसे करे ओर प्राणायाम से कुंडलिनी शक्ति जागरण कैसे करे आदि के बारे में जानकर अच्छा लगा हो. अगर आप इसके बारे में और कुछ जानना चाहते हैं तो निचे Comment* करे और अगर योगी जी से संपर्क करना चाहते हो तो ऊपर बताये गए पते पर संपर्क करें.

Pranayama Video 

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