कामाख्या मंदिर में योनि की पूजा और साधारण स्त्री से छुआ-छूत ऐसा क्यों ??

हिंदुस्तान की खुली संस्कृति और बंद सोच – रजस्वला स्त्रियां और कामाख्या मंदिर

kamakhya devi mandir in hindi

केरल कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष ऍम अस हसन ने फ़रमाया है की मासिक धर्म के दिनों में महिलाए अपवित्र होती हैं और उन्हें ऐसे में किसी पूजा स्थान में नहीं जाना चाहिए. हसन की क्यों और भी लोगों तथा और भी सम्प्रदायों में यही माना जाता हैं की रजस्वला स्त्री अपवित्र होती हैं.

इसी मान्यता के चलते कई बार किशोरियों से ऐसा छुआ-छूत का बर्ताव किया जाता हैं की उन्हें अपने परिवारजनों के सामने संकोच और शर्मिंदगी के क्षणों का सामना करना पड़ता हैं. उन्हें अपवित्र महसूस करवाया जाता हैं.

और यह भी उस भारत में जो सांस्कृतिक रूप से ऐसी उदार और वर्जनारहित सोच का भी उदहारण रखता हैं जहां देवी कामाख्या के मंदिर जैसा विलक्षण तीर्थ भी, जहां योनि पूजन होता हैं और स्त्री के रजस्वला होने को अपवित्र मानने के बजाए उसकी पवित्रता का उत्सव मनाया जाता हैं.

असम के कामाख्या मंदिर में हर साल अंबुवाची के मेले के दौरान माँ रजस्वला होती हैं, योनिकुंड से होने वाले जल का प्रवाह लाल हो जाता हैं. इस दौरान देवी की योनि को आच्छादित करने वाले कपडे को प्रसाद मानकर वितरित किया जाता हैं और लोगों द्वारा पूज्य भाव से मस्तिष्क पर लगाया जाता हैं.

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इस तरह की सांस्कृतिक विरासत के बाद भी वर्जनाए पालना हैरान करने वाला हैं. खैर, फिलहाल तो मासिक धर्म की छुआ-छूत और अपवित्रता की ग्रंथिया पाले रखने के बजाये ज़माने के हिसाब से इस मुद्दे को देखना जरुरी हैं ताकि लड़कियां इस प्राकृतिक प्रवाह के दौरान हिजिन मेंटेन कर सकें.

इसके लिए अलग बैठने की नहीं साफ़ सुथरी अंतर अन्तर्व्यवस्था की जरुरत होगी. मुझे पिछले दिनों लोकसभा संसद सुष्मिता देवा का एक एक ईमेल सन्देश मिला हैं जिसमें उन्होंने एक याचिका पर हस्तक्षार करने का निवेदन किया हैं जो वित्तमंत्री को भेजी जानी है.

इस याचिका में सेंटरी नेपकिन्स को कर मुक्त करने की बात उठती हैं ताकि हर कसबे की बच्चियों को कम दर पर साफ़ सुरक्षित उत्पाद मिल सकें. कई एनजीओ भी इस दिशा में काम कर रहे हैं आज के आधुनिक भारत को इसी तरह के प्रयासों की जरुरत हैं, पहले ही भीतर गहरे तक धंसी वर्जनों को गाढ़ा करने वाले बयानों की नहीं.

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निर्मला भुराड़िया
सोर्स : नईदुनिया

अगर भारत के लोगों को क्रांति करना हैं, अपना जीवन बदलना हैं तो ज़माने के साथ-साथ अपनी सोच भी बदलना होगी. अगर भारत के वासी पुरानी सोच को लेकर चलेंगे तो भारत वैसे ही बहुत पीछे हैं, और ऐसा करने से वह और पीछे खिसक जायेगा.

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