पशुबलि धर्मो एवं मानवता पर एक कलंक। Animal Sacrifice in Hindusim

Animal Sacrifice in Hindusim

animal sacrifice in hindi

पशुबलि धर्मो एवं मानवता पर एक कलंक।

आईये हम आज Animal Sacrifice in hindusim के बारे में जाने बडे दूर्भाग्य की बात है आदिम मानव- नरपशुओं के समय जैसी कुप्रथाएँ Cruel जो किसी षडयंत्रवश वेदों के शब्दों का गलत अर्थ लगाकर मध्यकाल में पंपायी गयीं, आज भी दिखाई देती है । पशुबलि उनमें से एक है..

मूक पशु–पक्षियों का देवी देवताओं के नाम पार कत्ल किया जाना उन देवताओं की महिमा को समाप्त करके सारे सभ्य समाज के लोगो के सामने उन्हें घ्रणित, निंदित, निच, क्र्र, हत्यारा सिध्ध करना है। जिस देवता को प्रसन्न करने के लिए बलि चढाई जाति है,(Animal Slaughtering) वस्तुत: असीम कष्ट और असीम लज्जा इस कुक्रत्य से होती है।

क्योंकि ‘देवता’  शब्द ही दिव्य-तत्व, दया, करुणा, दान, उदारता, सेवा सहायता आदि सत्प्रव्रत्तियों का घोतक है जिसमें यह गुण न हों उलटे नन्हें मुन्ने, बेबस और बेकस प्राणियों का खून पीने कि ईच्छ हो, उन्हें देवता कोन कहेगा ? वे तो असुर एवं पिशाच ही गिने जायेंगे ।

देवताओं के महान गौरव को नष्ट कर उन्हे दुनिया के सभ्य समाज के सम्मुख इस बुरे रुप में उपस्थित करना वस्तुत: उनके साथ दूश्मनी करना है । Animal Sacrifice in Hindusim Hindi 

उन्हें कलंकित का प्रयत्न करने वाले के प्रति वे प्रसन्न होंगे, इसकी आशा कदापि नहीं कि जा सकती । परिणाम स्वरुप जो लोग पशुबलि करते है, उनमे उलटे रोग, शोक, अज्ञान, आदि क्लेश-कलह, दुष्टता, दुर्बूध्दि आदि अनेक दुखों की ही व्रध्दी होती है ।

अनेंको देव मंदिरो में पशुबलि,(Animal Slaughtering) होते देखकर किसी भी ऐसे विचारशील व्यक्ति के मन पर भारी आघात लगता है । इसके वही देवता द्यालु सहद्य, उदार, करुणा और सहायता करने वाले है ।

फिर वो पशु-पक्षियों का खून पिकर प्रसन्न हो यह कैसे सम्भव है ? धर्मशास्त्रों को जितना ही गंभीर द्रष्टि से देखा जाय, उतना ही यह पक्का होता जाता है कि हमारा धार्मिक तत्वज्ञान और आदर्श भी इस बात से सहमत नहीं हो सकता है कि कोई देवता पशु-पक्षियों क मांस खाने या खून पिने की आकांक्षा करता है या इस कार्य में उसे कुछ प्रसन्नता हो सकती है ।

साधारणत: भोले-भाले अज्ञानग्रस्त लोग ऐसा सोचते है कि काली माई हमारे द्वारा पशु पक्षियों का मांस खिलाने से प्रसन्न होगी और हमारि मनोकामनाएं पूरी करेंगी ।

बाल बच्चे पेदा नहीं होते होंगे, तो बच्चे पेदा कर देगी, मुकदमा जिता देगी, धन देगी, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करायेंगी, हमारे हर कार्य में सफलता देगी, वे एक रिश्वत के रुप में देवी को मघ, मांस खिला-पिला कर प्रसन्न करना चाहते हैं और उसमें मनमाने वरदान प्राप्त करना चाहते है । यह मान्यता सर्वथा असंभव एवं भ्रमपूर्ण है ।

बेचारे निरिह बकरे भेंस माता के सामने निर्द्यता पूर्वक कत्ल किये जातें हैं और उनके रक्त मांस को खाने के लिए उपस्थित किया जाता है । यह कितना न्रशंस कार्य है । इससे देव‌‌‌आत्माओं कि तो क्या इस म्रत्युलोक की सधारण नारी की भी अंतरात्मा चित्कार करने लगेगी ।

यदी कोई दुष्ट मनुश्य किसी माता कि गोदी से बच्चा छिन्कर उसकी आंखो के सामने उसका कत्ल करे और फिर उसके कलेजे के टुकडे, उस बच्चे का खून मांस उस माता के मुंह में ठुसे तो उसे कितनी मार्मिक व्यथा होगी, इसकी कल्पना कोई बाल बच्चेदार सह्दय व्यक्ति हि कर सकते है ।

जिस दुष्ट व्यक्ति ने यह न्रंशस कर्म किया है, क्या उससे बह माता कभी प्रसन्न होगी ? क्या उसे कोई उपहार या वरदान देगी जरुर ही ऐसा नहीं हो सकता । वह उस कुकर्मी को शाप और दंड देने कि बात ही सोच सकती है ।

अर्थ का अनर्थ हो गया,

प्राचीन ग्रंथों में आलंकारिक रुप से आध्यात्मिक भूमिका में दुर्गुणों को छोडने एवं स्वार्थों को छोडकर परमार्थ के लिए त्याग एवं साहस दिखाने के अर्थ में पशुबलि ,(Animal Slaughtering) का प्रयोग हुआ है ।

म्ध्य-कालीन अंधकार युग में यज्ञों में पशुबलि की प्रथा चल पडी । अर्थ का अनर्थ करने वालों ने यज्ञ में गौ, घोडे, बकरे, मनुष्य होमने शुरु कर दिये । गौमेध यज्ञ, अजमेध यज्ञ, नरमेध यज्ञ के जो वास्तविक अभिप्राय थे, उन्हें भुलाकर पवित्र यज्ञ कार्यो को न्रशंस हत्याकांडों से परिपूर्ण कर दिया ।

यह प्रचलन जिन दिनो चल रहा था, उन दिनों भि विचारशील लोगों ने इसका समुचित विरोध किया था ।

प्राचिन पुस्तकों में इस विरोध का स्पष्ट उल्लेख मिलता है पर उन दिनों शासकों और पूरोहितों की ऐसी सम्मिलित दुरभिसंधि चल पडी कि आँधी तूफान की तरह यह बढ्ती हुई दुष्टव्रत्ति रुक न सकी ।

बहुत दिनों तक यज्ञों को कलंकित करने वाले यह हत्याकांड होते रहें । अंत में इसी दुष्टता की प्रबल प्रतिक्रिया के रुप में जैन धर्म के संस्थापक महावीर स्वामी और बुध्द धर्म के संस्थापक गौतम बुध्द अवतरण हुआ ।

उन्होंने अथक परिश्रम करके इस कुप्रथा को हटाया और भारतिय धर्म की आत्मा में अहिंसा की पुन: प्रतिष्ठापना की । 

आज वही अनीतिपूर्ण बलि प्रथा जहाँ-तहाँ प्रचलित है । कुछ दिन पूर्व यह अंधेर जितने उग्र रुप में होता था उतना अब नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक विचारशील व्यक्ति इसके विरुध्द है । मानवीय अंतरात्मा कभी भी ऐसे दुष्ट कर्मों को धर्म क अंग नहीं मान साकती

यह अंधिश्वासी प्रथा बंद होना ही चाहिए,

बलिदान का उद्देश्य संतान, धन स्वास्थ्य या किसी अन्य प्रकार का लाभ प्राप्ति होता है, पर इससे कर्ता की मूढता ही प्रकट होती है । इस प्रकार के अंधविश्वास जंगली और असभ्य जातियों में ही पाये जाते हैं ।

वे क्रुर देवताओं के सम्मुख पशु-पक्षियों को ही नहीं मनुष्य तक का बलिदान कर डालते हैं । पर वेद शास्त्रो के, महान अध्यात्म ज्ञान के अधिकारी भारतवासी भी यदी उनका ही अनुकरण करें तो यह खेद और निंदा की बात ही समझी जाएगी ।

हिंदुओं के धर्म ग्रंथो में “वसुदेव” कुटुम्बकम” के महान सीध्दांत की घोषणा की गई है और मनुष्य को आदेश दिया गया है कि वह इन प्राणियों के प्रति सदैव दया और करुणा का व्यवहार करें ।

संसार के सभी संत और साधु पुरोषों ने भी अपने अनुयाइओं को यही उपदेश दिया है कि सभी जीव जंतुओं पर दया रखी जाय और निर्थक कभी किसी को कष्ट न पहुँचाया जाय ।

देवी-आत्माओं को बदनाम करने वाले,

जब सामान्य रुप से मांस खाने के लिए पशुओं  का मारना बुरा समझा जाता है, तो देवी-देवताओं के सामने पशुओं की गरदन काटना उससे कहीं अधिक बुरा और गर्हित कर्म कहा जाएगा ।

जब हम देवताओं को पर्मात्मा का विषेश अंश और मनुष्यों के लिए कल्याणकारी बतलाते हैं, तो फिर यह कैसे सम्भव हो सकता है की वे सीधे–सिधे पशु-पक्षियों के रक्त और मांस से प्रसन्न हो सकें ?

ऐसे देवताओं की कल्पना और मान्यता राक्षसी स्वभाव के मनुष्य हि कर सकते है । सभ्य और शिक्षित लोग तो ऐसे कार्य को घ्रणा और विरक्ति के भाव से ही देखेंगे ।

अन्य मतावलंबियों द्वारा जीव हिंसा का निषेध,

ईसाई धर्म में जगह-जगह सब प्राणियों की रक्षा और उनके साथ मेहरबानी क बर्ताव करने का उपदेश पाया जाता है । स्वंय ईसामसीह तथा उनके सब अनुयायी संत-पुरुष पशु हिंसा से प्रथक रहकर दूध, रोटी, खजुर, अंजीर, आदि से उसरपोषण किया करते थे ।

यहुदी तथा पारसी धर्म बडे पुराने है । यद्पि तत्कालीन परिस्थितियों के कारण वे अन्न और वनस्पतियों की कमी के कारण मांस का भी प्रयोग करते थे, पर उन्होंने धर्म की द्रष्टि से पशु हिंसा को अनुचित हि बतलाया है ।

यहुदी धर्म ग्रंथ का वचन है कि ‘बकरों और बछडों” के रक्त से नहीं, वरन अपने ही परिश्रम व त्याग से स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्तीप्राप्ती हो सकती है ।

कुरान में लिखा है कि – “हरा पेड काटने वाले, मनुष्यों खरीद-फरोख्त करने वाले, जानवरों को मारने वाले तथा परस्त्रिगामी को खूदा माफ नहीं कर सकता । खूदा उसी पर रहम करता है जो उसके बनाये जानवारों द्या व सद्भाव से पैश आता हो ।

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दार्शनिक पैथागोरस ने एक स्थान पर कहा है- ‘ए मौत के जबडों में उलझे हुए इंसान अपनी तश्तरियों को मांस से सजाने के लिए जीवों कि हत्या करना छोड दे ।

जो भोले-भाले पशुओं की गरदन पर छुरी चलवाता है, उनका करुण क्रंदन सुनता है, जो अपने हाथों पाले हुए पशु-पक्षियों की ही हत्या करके अपनी मौज मनाता है, उसे अत्यंत तुच्छ स्तर का व्यक्ति समझना चाहिए ।

जो पशुओं का मांस खा सकता है, वह किसी दिन मनुष्यों का भी खून पी सकता है ।

पशुबलि,(Animal Slaughtering) कुछ लोग करें और शेष लोग चुपचाप देखें उसके विरुध्द न कुछ कहें न कुछ करें, यह सब प्रकार अशोभनीय है । भगवान ने वाणी और शक्ति, दया और करुणा इसलिए दि है कि उसका उपयोग अन्याय को रोकने, अधर्म क प्रतिकर करने और दुर्बलों क पक्ष लेने में व्यय करें । पशुबलि भारी भ्रम है, भारी पाप है ।

जिसका फल दू:ख और दंड के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता है । उससे स्वंय बचने का और दूसरों को बचाने का प्रयत्न करना प्रत्येक विचारशील एवं मानवतावादी धर्म प्रेमी का परम कर्तव्य है |

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